पत्ता अनारों का, पत्ता चनारों का
जैसे हवाओं में
ऐसे भटकता हूँ, दिन रात दिखता हूँ
मैं तेरी राहों में
मेरे गुनाहों में, मेरे सवाबों में शामिल तू
भूली अठन्नी सी
बचपन के कुरते में से मिल तू
रखूं छुपा के मैं सब से वो लैला
मांगूं ज़माने से, रब से वो लैला
कब से मैं तेरा हूँ
कब से तू मेरी लैला
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