पर्वत कितने ऊँचे कितने गहरे होते हैं
कुछ मत पूछो प्यार पे कितने पहरे होते हैं
इश्क़ में जाने क्या हो जाता है ये रब ही जाने
तोड़ के सारी दीवारें मिल जाते हैं दीवाने
ओ ले जा मुझे परदेसी
कि तेरी मेरी एक ज़िंदड़ी
घर आजा सजना परदेसी
रब दा शुक्र मनावाँ मैं


Write a comment ...